Sunday, March 20, 2011

Holi Ke Kai Prashn

आपके पतले पीले चप्पल
मुझसे पूछने लगे
सवाल जिनके जवाब
मैं जानते हुए भी
अनजाने कर देती हूँ
आपका वहाँ न होना
मेरी ज़मीर को खरोचे
हँसे मेरी हालत पर
दो पल की महमान हो तुम
हम तो यहाँ राज करें हैं
आज तुम ही सही
कल कोई और
इस सफ़र मैं तुम्हारा हक नहीं
यहाँ तुम्हारी मंजिल नहीं
रंग मेरा जो तुमने चुराया है
वो तुम्हारा नहीं शर्म का है
होली का है जले का है मरे का है
तुम एक मेहमान भी तो नहीं
पीली चप्पल तुम्हारी मुझसे
नीली चादरों पे मिलती है
ऐसी बातें करती है
कभी रंग चढ़ाती है
कभी रंग उतारती है
उस कोने की इतनी सी बात
मेरे ज़ेहन से कभी गुज़रती तो
मेरी पहचान उस चप्पल मैं पड़ी
उनके क़दमों तले बिखरी
एक लाचार कविता
सन्नाटे में आपसे अपनी आज वापस मांगती है ....

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